Tuesday, 10 October 2017

बेटियों की चहकन....



भोर होते ही 
लगतीं  हैं  चहकने 
जैसे बगीचों में
चहचहाते  पक्षी 
कानो में घोलते हों 
रस मीठा सा ..... 

वो....  जो हरी घास पर 
बिछी थी सुथराई 
उनके पैरों से लिपटकर 
मचलने सी लगी है 

रंभाती गायों के बीच 
उनकी खिलखिलाट 
अधरों को दे ही देती है 
अर्धचन्द्राकार  लकीर .. 

उनकी अल्हड़ शरारतों के बीच
लौट आता है माँ का बचपन

बेटियां होती हैं ... 
चिड़ियों की  चहकन जैसी 

Tuesday, 3 October 2017

झरता है घन ....



क्यों पोंछ  देते हो
वेदना के दाग 
झकझोर कर  स्मृतियाँ 
.. प्रात  की रश्मियों से

तमी  के आँचल से  खींच
क्यों बिखरा देते हो
 रंग सिन्दूरी
घुलने लगते हैं राग
विहगों के.. 

कपोलें हटा देती है
पल्लवों के घूंघट
महकता है उपवन.. 


 नित्यप्रति , इसी क्षण
 गूंजने लगता है
 संगीत सा कुछ .. 

मेरे सूखे कोरों से फिर 
घुमड़ -घुमड़ 
झरता है घन..... 

Friday, 21 October 2016

पथिक...




पीर दिखने लगी है
रपटने लगे हैं भाव
अंतस में जम गई काई
अबोले ही.......

दोष नहीं है तुम्हारा
न रोष है नियति पर मुझे
अनचाहा गीत ही सही
बज जाने दो......

न रक्तिम हूं
ना ही तुम्हारा रक्त
पश्चाताप में सही
भस्म हो जाने दो

यायावार हूं
अज्ञानी भी
अक्खड़ हूं
अभिमानी भी
अब
मुझे पथिक हो जाने दो
अब
.. पथिक हो जाने दो

Wednesday, 19 October 2016

उपवास....

alka awasthi

 नहीं है उपवास मेरा 
तुम्हारी लंबी उम्र के लिए
 भरोसा है मुझे
अपनी सांसों  की डोर पर 
कि  मजबूत हैं जब तक वो
 कुछ नहीं  होगा  तुम्हें

हाथों की लकीरें 
 ले आयी हैं जो तुम तक 
विधाता की रची  ही तो हैं 
 देखो ना....  शहर में तुम्हारे 
उत्तरवाहिनी  हैं  गंगा भी

हो सवार समय रथ  पर
 नित्यप्रति 
 तय कर रहे हैं हम 
नया सफर

 तपिश तरणि  की 
जिस रोज न जलाये तुम्हें
समझ  लेना मुक्त हो गई मैं 

प्रत्येक विभावरी
तब रखूंगी उपवास 
ऊँचे नीले वितानों पर ......




Sunday, 16 October 2016

समय का चक्र .....

alka awasthi
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समय कहाँ भर पाता  घाव 
वो तो बड़ी सहजता,  सुगमता से 
कुरेदता  सपने... 

समय अक्खड़ -अडिग 
मुस्कुराता उसी ठौर 
जहाँ बिखरे पड़े हों सपने ..

 समय बुनता  चक्र 
हम अदने से फंसते 
जाल में.. 

समय बेचारा सा
हो जाता बेबस 
जब उसकी दी  चोट के  बावजूद 
उठ खड़ा होता कोई

सुनो  हे समय 
मेरे दर्द की दवा 
पूँछूँगी  तुम्ही से 
एक  बारगी ही सही 
कहीं मिलो तो मुझसे ....

  

Thursday, 13 October 2016

अतीत की महक ...

alka awasthi



फैला कर बाहें प्रेम की
जाने कितनी बार 
 स्पर्श कर चुकी हूँ
चौखटों को  अतीत की


ले आती हूँ  धूल  मुट्ठी भर
बनाती हूँ तूलिका 
तुम, मैं, और समय 
आह ... 
 
 काश समझ पाती
नादानियां 
 समय रहते 

तो शायद
 मेरा आज 
दे पाता  मुस्कुराहटें चंद
कि ..  
 महसूसती   मैं भी
 महक लाल गुलाल की.. 




Saturday, 8 October 2016

सिसकियों की कतरन..

alka awasthi

कट जाने दो
कतरा -  कतरा
बह जाने दो
नदियां रक्त की
धरा के जर्रे जर्रे में चटखे
सुर्ख लाल रंग


मत पीटो
 दिखावे का ढोल
पढ़ाने, आगे बढ़ाने
हिम वेणू पर बिठाने के
सब्जबाग मत बोओ


 तन कर
अट्टालिकाओं  पर
पीटते हो पुरानी लकीरें
 दूर तक इंगित कर
गिना देते हो चंद नाम
गूंजती है जिनकी धमक
ऊंचे नीले वितानों पर

वो धनी थीं  किस्मत से
बदली जिन्होंने
तकदीर ..
लेकर तलवारें संघर्ष की
माथे पर गोद लिया "विजयी भव"


पर सुनो ..
हर संघर्ष की गाथा
कहलाए विजयश्री
जरुरी तो नहीं...


उसने भी चलाए थे
बरछी, ढाल, कृपाण
 वह ..
जो चिराग थी घर का
जिसकी अस्मत हुई तार-तार
जो आगोश में रात के ऐसा सोई
 कि फिर ना उठी


उस दिन ..
शर्मसार हुए क्या
 वो चंद लोग
जो खो गए
भीड़ में जलाते होंगे
कहीं मोमबत्तियां


तो तुम ही कहो ..
उन सिसकियों की कतरन तक
 खौफ में घुटें
या कोख में कट जाएं


हश्र तो वही है उनका
हो जाती हैं कतरा कतरा
धरा पर चटखता है सुर्ख लाल रंग..

Monday, 5 September 2016

आयु भर आशीष....

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नित्य प्रति
व्योम के छोर में
छिन्न- भिन्न
टिमटिमाते हैं नाना - बाबा
झांकती हो तुम
विधु  के झरोखे से...

टपकाने लगती है रात
अमृत की
असंख्य बूंदे

कुलांचे भरते हरसिंगार को
थाम लेती है धरित्री

कुहुकती है कोयल
उन्मुक्त रंभाती हैं गायें

निथर आती है सुथराई
हरे - पीले पत्तों पर

अंशुमाली की प्रथम रश्मियों संग
उतर आता है प्रेम तुम्हारा
स्व में स्व से उगते क्षणों सा
देने को आयु भर आशीष..

अबोले
यूं ही मां
तू साथ है मेरे....

Sunday, 19 June 2016

सुनो हे पिता.....



फलानी दुकान से
लानी है किताबें
स्कूल में दिलाना है दाखिला ..


फलाने दर्जी से
सिलवानी है यूनिफार्म
 जिससे बच्चे की
फिटिंग बैठे ....


फलाने हलवाई से
 लाने हैं लड्डू
दाखिले की
खुशी जो है
साइकिल का टायर
फिर बनवा लूंगा ....


दिन -महीने और
जाने कितने साल
फलां -फलां करके
काट दिए तुमने....


 जाने कहां कहां से चुने
फूल जीवन के
बिना देखे
सबमें बांट दिए तुमने ....


सुनो हे पिता
 तुम्हारा तप
तुम्हारा त्याग
 तुम्हें ईश्वर से
बेहतर बनाता है
मेरे लिए सर्वोपरि हो तुम.....

Tuesday, 8 March 2016

शनै..शनै....

alka awasthi



टूट चुकी है साख
गहराने को हैं रंग 
दरख्तों के...

सरसों के रौंदे खेतों में 
कब, किसने देखी है !
बसंत की आवक..

कौन चढ़ाता है
सूखे फूलों को
देवालयों, मज़ारों पर..

 भट्ट लाल 
भानु के ताप से
सूख जाती हैं
 नदियां भी..

मैं नहीं हूं सागर
कि हो ..
अंबार..
गुंजाइशों का.....

मैं प्रेम हूं 
बहकर निकल गई
कोरों से...

Friday, 22 August 2014

घरौंदा....

alka awasthi


पलकों के संपुट तले
आंशिया है मेरा
घरौंदा मन का....

चली जाती हूं हर रात
उसे बुहारने
झाड़ने, पोंछने  
सुखद है यह अहसास भी....

सहेजा है
कमरेां  में
मीठी यादों को

तुम्हारी ठिठोली
तुमसे बतियाना
वो गंगा किनारे पहरों बिताना

चुस्कियां चाय की
गलियों में खो जाना
इठलाना- इतराना
तुम संग कुछ गुनगुनाना

हां बस ...
अब यही नियति है मेरी
सोचती हूं
क्यों नहीं बंद हो जाती
ये मुई पलकें
ऐसे ही सही
अहसास तो रहता तुम्हारा......

Friday, 8 August 2014

मां...शाश्वत

alka awasthi

चलती हूं मां
लौटूंगी जल्द ही
ध्यान रखना तुम घर का
मेरी चिन्ता में
आधी हो गई थी तुम भी .....

बड़बड़ाती थी मैं
जाने कैसे
रोकने को आंसू
जो थे आमादा
मां से लिपटकर रह जाने को

मां होती तो
नहीं रोक पाती खुद को
गिरा ही देती नमक
जिसे चखकर
नहीं बचता मेरे पास
कहने को कुछ भी

अपने हर कदम पर
देखती रही मुड़़-.मुड. के
अब नहीं दिखेंगी कभी
वो भरी भारी आंखें
और हिलता हुआ हांथ...

उफ् ये तल्ख अहसास
चिपक जाता है मां से

मां........
तुम्हारा न होना
नभ के उड.ने जैसा है
मानो शाश्वत अनिश्चित हुआ......

 

Saturday, 22 February 2014

तुम्हारी स्मृति. . .



तुमसे  बतियाना   
जैसे मरुस्थल का 
एकाएक हरा हो जाना 
लू के थपेड़ों के मैदान में 
सघन पीपल का गुनगुनाना
तुमसे बतियाना . . .
यानी-------
कैलेण्डर की उस तारीख का फूल बन जाना
जैसे घड़ी की सुइयों का खिलखिलाना 
उसके बाद भी देर तक 
मेरे अंतर्मन में उग आये 
कमल पत्तों पर 
तुम्हारा थिरकना 


तुम्हारा मुझे 
अच्छा आप हैं वही.......
कहने का अर्थ है 
मेरे शब्द कोष में 
नाचते मेघों तले
रिमझिम संगीत लिए 
पोखर का झील बन जाना 
गेहूं की पकी फसलों का 
सुनहरी झील बन जाना

तुमसे बतियाना .........
और टिमटिमाते  तारे 
तारों में तुम्हें तलाशना 
 बहना अश्रु झिपों  से झर -झर. . . . 


तुमसे बतियाना .........

Monday, 23 September 2013

वेदना...





नयनों में भर तुम्हारी दीठ
लटका लेती हूं पैर
सांझ के उस पार....

वेदना की काई
निकल आती है पोरों से...

बूझ नहीं पाती
प्रात की पहली सुथराई का
यूं झर-झर बहना

पलकों के संपुट खोल
लगाती हूं आवाज कर्कश
सभी वाद विवाद प्रतिवाद
दिखते हैं ..........
उंचे नीले वितान पर

अधर हिलते हैं
मैं समझ लेती हूं
जीवन गति छोड़
चाहता है विश्राम
मेरा ईष्ट......
दूर हो गया मुझसे!


Monday, 7 January 2013

विजन पथ ..




प्रतीक्षा में तुम्हारी
जाने कितने दिव 
नाप डाले सूर्य-शशि  
लौटोगे हे यायावर ?

प्रथम रश्मियों संग 
अधूरा है जो राग 
होगा कभी पूर्ण !

चुक रही है 
हथेलियों में भरी रेत 
समय दौड़ रहा है निर्बाध 
क्या आज भी तुम
रेखाओं  में उलझे हो !

बाहर निकलो 
इस मकड़ जाल से
मैंने सुना है 
बनती-बिगडती हैं 
हाथों  की लकीरें 


बहुप्रतीक्षित है 
भेंट तुमसे ...

साँस चुकने से पहले 
विजन पथ पर
साथ चलोगे न 'मित्र' !




Tuesday, 23 October 2012

जाने क्यूँ .......?





"मुद्दतों
जिन ख्वाबों को बुन
तकिये के लिहाफ पर रख
रूबरू  हुए थे 
सुकूं से 
आज.....
वही ख्वाब
चुभते हैं
और नींद....
कोसों है दूर
खिझाती  सी
जाने क्यूँ ......."

Sunday, 4 December 2011

पाथेय..














रे मन
कहाँ चाहते हो विचरना
औ सुनो..
ठहरने का ठौर भी कहाँ है ?
इसलिए बाँध लो पाथेय
जिस पथ मैं रुकूँ
तुम चलो..

भींच कर यूं मुठ्ठियाँ 
कैद क्या हो कर रहे
विस्मृत कर स्मृतियाँ 
बस बढ चलो 
जो राह मिले 
नेह में यदि मैं गिरूँ 
तुम उठो..

सुनो..
क्या चाहते हो खोजना 
जो मुस्कराहट के
बीज बोये थे 
वो फसल 
काट ली है किसी ने 
अच्छा हुआ..
वो फलियाँ प़क कर 
 नासूर बन गयी थी
शूल पथ पर 
यदि मैं थकूँ
तुम चलो.. 

बांध 
भावनाओ का 
भर गया था
इन मुई पलकों में 
आज जम गया 
अभी- अभी इसे  छूकर गयी है 
भावहीन ठंडी बयार
शीत बनकर जिस पथ
मैं जमूं
तुम बहो.. 

बातें पर्वतों की तरह
खड़ी हो गयी थी जो
चल पड़ी हूँ वहां से
ये व्यथा बनाएगी
इक नया रास्ता
दीप बनकर जिस पथ
मैं बूझूं 
तुम जलो.. 

लीक पर तू मत विचरना
लीक पर  तो वो  चले 
जिनके दुर्बल हों चरण
जो पथ स्वयं से
मैं बुनू 
वो तुम चुनो ..  

मैं मुसाफिर, तू मुसाफिर 
शूल से फिर क्यों डरें
इक ठांव जो हम रुक गए
तो फिर
पथिक ही क्या रहे
इसलिए
बाँध लो पाथेय
जिस पथ मैं रुकूँ
तुम चलो...

Saturday, 20 August 2011

हाशिये पर..


अविराम!
घात अघात के मध्य  
उर की तप्त व्यथाएं
न जाने कब?
बन जाती हैं
करुण कथाएँ
क्षीण कंठ की

रात के पसरे सन्नाटे में
नींद से कोसों दूर
भक्क लाल आँखों में
जलती रहती हैं स्मृतियाँ

कुछ चुह्चुहाई बूंदों से
सने होते हैं  गाल
और आँखों से निरंतर
उठता रहता है धुंआ

भींच लेती हूँ मुट्ठियाँ
देखती हूँ लकीरें हाथों की
जो सहसा धुंधलाती 
प्रतीत होती हैं 
ठीक रात जैसी

दिखती है तस्वीर  
खिचें हैं अनगिनत
आड़े तिरछे हाशिये

शायद..
यादों के निशां
बदल रहे हैं अपनी
दिशा-दशा

नक्षत्रों के नीचे
इस पार
पसीजते हैं पल

उस पार..
सब समझते हैं
कितनी खूबसूरत है ज़िन्दगी ..!

Tuesday, 2 August 2011

उपहार..


कुछ खास अवसरों पर देखती हूँ 
लोग कुछ खास करना चाहते हैं 
जाकर तरह-तरह की दुकानों में 
बिलकुल अलग कुछ मांगते हैं 
जाने कितने रंगों से भरा समंदर 
समेटे होता है हर काउंटर 

कुछ भी चुन लीजिये साहब 
हर तरह के उपहार हैं 
कुछ आकृतियाँ, कुछ ग्रीटिंग कार्ड हैं 
कुछ पर शिमला-मसूरी-देहरादून हैं 
कुछ पर नावें और सतरंगी फूल हैं 

कहीं कान्हा के संग राधा है दीवानी 
कहीं जंगल बादल और है झरने का पानी

ये मूर्तियाँ हैं फेंगशुई की 
घर में खुशहाली लाती हैं 
दुकानदार की ये बातें 
मुझे परेशान किए जाती हैं 

मौन होकर सोचती हूँ 
क्या तुम्हें भी ये उपहार पसंद हैं! 
गिने चुने अवसरों के बाद जिनका 
न कोई रूप है न रंग है 

कुछ ऐसा लेना है मुझको 
जो महज अवसरों पर नहीं 
अकेलेपन, बेरौनक उदासी के समय 
तय कर सके लम्बी दूरी 
और झट से तुम तक पहुँच कर
साक्षी हो जाए मेरे अपनेपन का
अनोखा साथी मन के सूनेपन का 

एक ऐसा उपहार 
जिसमें सौहार्द का स्पर्श
आत्मीयता की गंध हो 
दिखावट से मुक्त 
जो स्वतंत्र हो, स्वच्छंद हो
एक ऐसा उपहार जो तुम्हें 
सचमुच पसंद हो.. 

( यह कविता मैंने अपने एक मित्र के लिए लिखी है जिसका उपहार  मुझ पर उधार है..)