Thursday, 13 October 2016
Saturday, 8 October 2016
सिसकियों की कतरन..
alka awasthi
कट जाने दो
कतरा - कतरा
बह जाने दो
नदियां रक्त की
धरा के जर्रे जर्रे में चटखे
सुर्ख लाल रंग
मत पीटो
दिखावे का ढोल
पढ़ाने, आगे बढ़ाने
हिम वेणू पर बिठाने के
सब्जबाग मत बोओ
तन कर
अट्टालिकाओं पर
पीटते हो पुरानी लकीरें
दूर तक इंगित कर
गिना देते हो चंद नाम
गूंजती है जिनकी धमक
ऊंचे नीले वितानों पर
वो धनी थीं किस्मत से
बदली जिन्होंने
तकदीर ..
लेकर तलवारें संघर्ष की
माथे पर गोद लिया "विजयी भव"
पर सुनो ..
हर संघर्ष की गाथा
कहलाए विजयश्री
जरुरी तो नहीं...
उसने भी चलाए थे
बरछी, ढाल, कृपाण
वह ..
जो चिराग थी घर का
जिसकी अस्मत हुई तार-तार
जो आगोश में रात के ऐसा सोई
कि फिर ना उठी
उस दिन ..
शर्मसार हुए क्या
वो चंद लोग
जो खो गए
भीड़ में जलाते होंगे
कहीं मोमबत्तियां
तो तुम ही कहो ..
उन सिसकियों की कतरन तक
खौफ में घुटें
या कोख में कट जाएं
हश्र तो वही है उनका
हो जाती हैं कतरा कतरा
धरा पर चटखता है सुर्ख लाल रंग..
कट जाने दो
कतरा - कतरा
बह जाने दो
नदियां रक्त की
धरा के जर्रे जर्रे में चटखे
सुर्ख लाल रंग
मत पीटो
दिखावे का ढोल
पढ़ाने, आगे बढ़ाने
हिम वेणू पर बिठाने के
सब्जबाग मत बोओ
तन कर
अट्टालिकाओं पर
पीटते हो पुरानी लकीरें
दूर तक इंगित कर
गिना देते हो चंद नाम
गूंजती है जिनकी धमक
ऊंचे नीले वितानों पर
वो धनी थीं किस्मत से
बदली जिन्होंने
तकदीर ..
लेकर तलवारें संघर्ष की
माथे पर गोद लिया "विजयी भव"
पर सुनो ..
हर संघर्ष की गाथा
कहलाए विजयश्री
जरुरी तो नहीं...
उसने भी चलाए थे
बरछी, ढाल, कृपाण
वह ..
जो चिराग थी घर का
जिसकी अस्मत हुई तार-तार
जो आगोश में रात के ऐसा सोई
कि फिर ना उठी
उस दिन ..
शर्मसार हुए क्या
वो चंद लोग
जो खो गए
भीड़ में जलाते होंगे
कहीं मोमबत्तियां
तो तुम ही कहो ..
उन सिसकियों की कतरन तक
खौफ में घुटें
या कोख में कट जाएं
हश्र तो वही है उनका
हो जाती हैं कतरा कतरा
धरा पर चटखता है सुर्ख लाल रंग..
Monday, 5 September 2016
आयु भर आशीष....
alka awasthifacebook
नित्य प्रति
व्योम के छोर में
व्योम के छोर में
छिन्न- भिन्न
टिमटिमाते हैं नाना - बाबा
टिमटिमाते हैं नाना - बाबा
झांकती हो तुम
विधु के झरोखे से...
टपकाने लगती है रात
अमृत की
असंख्य बूंदे
अमृत की
असंख्य बूंदे
कुलांचे भरते हरसिंगार को
थाम लेती है धरित्री
थाम लेती है धरित्री
कुहुकती है कोयल
उन्मुक्त रंभाती हैं गायें
उन्मुक्त रंभाती हैं गायें
निथर आती है सुथराई
हरे - पीले पत्तों पर
हरे - पीले पत्तों पर
अंशुमाली की प्रथम रश्मियों संग
उतर आता है प्रेम तुम्हारा
स्व में स्व से उगते क्षणों सा
उतर आता है प्रेम तुम्हारा
स्व में स्व से उगते क्षणों सा
देने को आयु भर आशीष..
अबोले
यूं ही मां
तू साथ है मेरे....
यूं ही मां
तू साथ है मेरे....
Sunday, 19 June 2016
सुनो हे पिता.....
फलानी दुकान से
लानी है किताबें
स्कूल में दिलाना है दाखिला ..
फलाने दर्जी से
सिलवानी है यूनिफार्म
जिससे बच्चे की
फिटिंग बैठे ....
फलाने हलवाई से
लाने हैं लड्डू
दाखिले की
खुशी जो है
साइकिल का टायर
फिर बनवा लूंगा ....
दिन -महीने और
जाने कितने साल
फलां -फलां करके
काट दिए तुमने....
जाने कहां कहां से चुने
फूल जीवन के
बिना देखे
सबमें बांट दिए तुमने ....
सुनो हे पिता
तुम्हारा तप
तुम्हारा त्याग
तुम्हें ईश्वर से
बेहतर बनाता है
मेरे लिए सर्वोपरि हो तुम.....
Tuesday, 8 March 2016
शनै..शनै....
alka awasthi
टूट चुकी है साख
गहराने को हैं रंग
दरख्तों के...
सरसों के रौंदे खेतों में
कब, किसने देखी है !
बसंत की आवक..
कौन चढ़ाता है
सूखे फूलों को
देवालयों, मज़ारों पर..
भट्ट लाल
भानु के ताप से
सूख जाती हैं
नदियां भी..
मैं नहीं हूं सागर
कि हो ..
अंबार..
गुंजाइशों का.....
मैं प्रेम हूं
बहकर निकल गई
कोरों से...
Friday, 22 August 2014
घरौंदा....
alka awasthi
पलकों के संपुट तले
आंशिया है मेरा
घरौंदा मन का....
चली जाती हूं हर रात
उसे बुहारने
झाड़ने, पोंछने
सुखद है यह अहसास भी....
सहेजा है
कमरेां में
मीठी यादों को
तुम्हारी ठिठोली
तुमसे बतियाना
वो गंगा किनारे पहरों बिताना
चुस्कियां चाय की
गलियों में खो जाना
इठलाना- इतराना
तुम संग कुछ गुनगुनाना
हां बस ...
अब यही नियति है मेरी
सोचती हूं
क्यों नहीं बंद हो जाती
ये मुई पलकें
ऐसे ही सही
अहसास तो रहता तुम्हारा......
सहेजा है
कमरेां में
मीठी यादों को
तुम्हारी ठिठोली
तुमसे बतियाना
वो गंगा किनारे पहरों बिताना
चुस्कियां चाय की
गलियों में खो जाना
इठलाना- इतराना
तुम संग कुछ गुनगुनाना
हां बस ...
अब यही नियति है मेरी
सोचती हूं
क्यों नहीं बंद हो जाती
ये मुई पलकें
ऐसे ही सही
अहसास तो रहता तुम्हारा......
Friday, 8 August 2014
मां...शाश्वत
alka awasthi
चलती हूं मां
लौटूंगी जल्द ही
ध्यान रखना तुम घर का
मेरी चिन्ता में
आधी हो गई थी तुम भी .....
बड़बड़ाती थी मैं
जाने कैसे
रोकने को आंसू
जो थे आमादा
मां से लिपटकर रह जाने को
मां होती तो
नहीं रोक पाती खुद को
गिरा ही देती नमक
जिसे चखकर
नहीं बचता मेरे पास
कहने को कुछ भी
अपने हर कदम पर
देखती रही मुड़़-.मुड. के
अब नहीं दिखेंगी कभी
वो भरी भारी आंखें
और हिलता हुआ हांथ...
उफ् ये तल्ख अहसास
चिपक जाता है मां से
मां........
तुम्हारा न होना
नभ के उड.ने जैसा है
मानो शाश्वत अनिश्चित हुआ......
चलती हूं मां
लौटूंगी जल्द ही
ध्यान रखना तुम घर का
मेरी चिन्ता में
आधी हो गई थी तुम भी .....
बड़बड़ाती थी मैं
जाने कैसे
रोकने को आंसू
जो थे आमादा
मां से लिपटकर रह जाने को
मां होती तो
नहीं रोक पाती खुद को
गिरा ही देती नमक
जिसे चखकर
नहीं बचता मेरे पास
कहने को कुछ भी
अपने हर कदम पर
देखती रही मुड़़-.मुड. के
अब नहीं दिखेंगी कभी
वो भरी भारी आंखें
और हिलता हुआ हांथ...
उफ् ये तल्ख अहसास
चिपक जाता है मां से
मां........
तुम्हारा न होना
नभ के उड.ने जैसा है
मानो शाश्वत अनिश्चित हुआ......
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