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Friday, 8 August 2014

मां...शाश्वत

alka awasthi

चलती हूं मां
लौटूंगी जल्द ही
ध्यान रखना तुम घर का
मेरी चिन्ता में
आधी हो गई थी तुम भी .....

बड़बड़ाती थी मैं
जाने कैसे
रोकने को आंसू
जो थे आमादा
मां से लिपटकर रह जाने को

मां होती तो
नहीं रोक पाती खुद को
गिरा ही देती नमक
जिसे चखकर
नहीं बचता मेरे पास
कहने को कुछ भी

अपने हर कदम पर
देखती रही मुड़़-.मुड. के
अब नहीं दिखेंगी कभी
वो भरी भारी आंखें
और हिलता हुआ हांथ...

उफ् ये तल्ख अहसास
चिपक जाता है मां से

मां........
तुम्हारा न होना
नभ के उड.ने जैसा है
मानो शाश्वत अनिश्चित हुआ......