Friday, 15 October 2010
आशाएं ......
आशाएं ......
कंकरीटों के महल में
कैदी की तरह रहता हूँ
सर पे मज़बूत है छत
अम्बर को तरसता हूँ
रंगीन खिलौनों के सेट
ढेरों रहते हैं बिखरे
उस मटमैली माटी के
ढ़ेलों को ढूंढता हूँ
रात के आँचल में
रहती है चमक उजली
चम् - चम् करते छुटपुट
जुगनूं की सोचता हूँ
ज़िन्दगी की दौड़ में
कुछ खो गए हैं जो
इस भीड़ में बिखरे
उन अपनों को देखता हूँ
सर पे मज़बूत है छत
अम्बर को तरसता हूँ .......
Monday, 20 September 2010
नन्हीं गौरैय्या
एक अदद
नन्हीं गौरैय्या
अक्सर........घर की छत से सटे
पेड़ की साख पर
दिनभर, फुदकते दिखती
है ....
इक रोज़ ,
उसकी कारगुज़ारियो को
नज़दीक से देखने को जी चाहा
दौड़ गयी दूर ......
उस मुंडेर तक
देखती हूँ ....
फुर्र फुर्र करती
ले आती है....
फ़ूस का एक टुकड़ा
रख़ देती है ....दो साखों के बीच
इक दूसरे से बाँधती
प्रीत की डोर जैसे .....
कुछ घास और तिनके
ले आती ...
बड़े जतन से
सूरज की बिखरती लालिमा के साथ
साँझ की चादर फैलने तक
करती रहती काम अपना
घर बनाने का यूं
लिए हुए सपना
दिन , हफ्ते और महीना बीत गया ...
इक रोज़ पड़ोस में बच्चों को
देखा चिड़िया से खेलते
अचानक याद हो आया
वो पुराना घोंसला ......
मन में देखने की इच्छा इतनी
की बस ......
जाकर देखती हूँ
बड़ा सुन्दर है छोटा सा घोंसला
पर....
गौरैय्या कहाँ ....?
मालिक बदल गया शायद ....
कुछ देर ठिठक कर सोचती हूँ
कहाँ गयी होगी गौरैय्या ......
नज़रें दौड़कर वापस आ जाती हैं .......
वक़्त था खुद को समझाने का
क्योंकि .............
बड़ा आम हो चला है चलन
किराये के मकां में सर छुपाने का !
Saturday, 14 August 2010
तुम जैसा ..........

तुम्हारी सादगी जिस तरह
घर कर गयी भीतर तक
फ़लक पर तुम्हें
वैसा पाती हूँ
कैसी डोर है !
तुम तक ..खिंची आती हूँ
बहकी मैं !
जाने क्या तलाशती हूँ .....
महकी पुरवाई हौले से
कहती है, सन्देश तुम्हारा..
क्यों देखती हो तुम मुझे ऐसे !
प्यार , आकर्षण , स्नेह , दोस्ती ...
किस रूप में देखती हो !
मैं अबोध सी ..
ठिठक जाती हूँ
हँस देती हूँ
अनार के दानों सम !
टुक - टुक निहारती तुमको
देखती हूँ तुम्हारी ऊँचाई
तुम्हारी निर्मलता
तुम्हारी सच्चाई
ज़मीं पर फ़ैली !
श्वेत सी परछाई !
चाहती हूँ पाना
तुम्हारी ये गहराई
शायद ........
इसलिए देखती हूँ
मैं तुम्हें ऐसे .....!
Thursday, 29 July 2010
बूँदें...........
बूँदें...........
रिमझिम फुहारों को अक्सर देखती थी,
अब जाना तूफां से डरना क्या है !
दूर तक फैले समंदर को ,
घंटो निहारा है मैंने ,
अब देखा .....
लहरों का बिखरना क्या है !
जिन मौजों पर पतवारों से ,
खेला करते थे हम ,
अब समझे .......
मौजों का रहना क्या है !
आज फिर झूम के ,
बरस गए बदरा,
अब जाना ..........
बूंदों का बहना क्या है !
अब जाना तूफां से डरना क्या है !
दूर तक फैले समंदर को ,
घंटो निहारा है मैंने ,
अब देखा .....
लहरों का बिखरना क्या है !
जिन मौजों पर पतवारों से ,
खेला करते थे हम ,
अब समझे .......
मौजों का रहना क्या है !
आज फिर झूम के ,
बरस गए बदरा,
अब जाना ..........
बूंदों का बहना क्या है !
Saturday, 17 July 2010
विचारों का प्रारंभ ........
विचारों का प्रारंभ ........
जब कभी भीड़ से परे
चल पड़ती हूँ , तन्हां रास्तों पे
कुछ यादें बन पुरवाई
घुमड़ने लगती हैं आस -पास
मन.........तय करता है लम्बी दूरी
विचारों के गाँव की
दीखते हैं कई घरौंदे ....
मीठेपन के ....भोलेपन के
कुछ खंडहर ....बड़बोलेपन के .....
एक सोंधी - सोंधी खुशबू है
कुछ अनुपम एहसासों की
चंचल मन भागता है
कभी इस छोर कभी उस छोर
और तभी ......
यादों की पुरवाई
फिर घुमड़ती है पास मेरे
दे जाती है.. मीठी मुस्कान
मन कहता है ,
नहीं हो तन्हा रास्तों पे
अकेली तुम ........
सच है,
मेरे विचारों का ....प्रारंभ हो तुम
Monday, 14 June 2010
एहसास
एहसास
तुम्हारे होने का एहसास
बहुत कुछ कह जाता है मुझसे
वो हंसी ठिठोली , वो मीठापन
कुछ दे जाता है जैसे
निश्छल भावों से वो तेरा
अंतर्मन तक कुछ कह जाना
फिर हौले से मुझसे सटकर
भीगी पलकों से मुस्काना
हर लम्हें को यूँ सच पूछो
इतना भीतर तक जीती हूँ
तुम मुझमें हो या मैं "तुम" हूँ
प्राणों से पूछा करती हूँ .............
Thursday, 10 June 2010
बेरुख़ी
भावनाओं की अभिव्यक्ति को लेकर एक चर्चा के दौरान कवि श्री आशुतोष जी
की ये रचना आपके समक्ष रख रही हूँ ....
बेरुख़ी
मैंने इंसानों को बदलते हुए देखा है
अपनी आँखों से दरख्तों को तडकते देखा है
इस खुदगर्ज़ ज़माने में ............
अपनों को अपनों से .....सिमटते देखा है
जिन शोख अदाओं को
पैमाना समझ कर
पीते रहे ए-दोस्त .........
उन पैमानों को चटकते हुए देखा है
देखता हूँ जब गौर से ..
तो वो दूर बहुत नज़र आते हैं
उनको जीने दो अपनी मर्जी से
हम तो ...अपनी मंजिल पे तरस खाते हैं
और ...........
जिनको कह रहे थे हम अपना वो तो...
परायों से भी बदतर नज़र आते हैं
बदतर नज़र आते हैं ............
की ये रचना आपके समक्ष रख रही हूँ ....
बेरुख़ी
मैंने इंसानों को बदलते हुए देखा है
अपनी आँखों से दरख्तों को तडकते देखा है
इस खुदगर्ज़ ज़माने में ............
अपनों को अपनों से .....सिमटते देखा है
जिन शोख अदाओं को
पैमाना समझ कर
पीते रहे ए-दोस्त .........
उन पैमानों को चटकते हुए देखा है
देखता हूँ जब गौर से ..
तो वो दूर बहुत नज़र आते हैं
उनको जीने दो अपनी मर्जी से
हम तो ...अपनी मंजिल पे तरस खाते हैं
और ...........
जिनको कह रहे थे हम अपना वो तो...
परायों से भी बदतर नज़र आते हैं
बदतर नज़र आते हैं ............
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