
हुलसते दृगों में
बह रहे थे स्वप्न हर्षिल
वक्त का पहिया चला यूं
सब, मूक हैं निष्प्राण हैं
गंध बनकर जो मलय
महकती थी चहुँ दिशा
रुख बदलकर चल पड़ी
नियति ही बलवान है
पुराने कोटर भी
हो गए हैं रिक्त
जिनमें रहते थे
जोड़े गिलहरियों के
बेला, विदा की
संताप नहीं कोई
समय के चक्र पर
मैं भी हूँ और तुम भी
उठ चली हूँ आज
एक पथ के पथिक से
हो गयी हूँ मौन
उत्थान -पतनाघात से
जीवन इसी का नाम है
रूकती नहीं कभी ये गति
सहज मूंदकर पलकें
जो मिट गया वह जी गया
पंथ पर छोड़ दिए हैं
मैंने कुछ पदचिन्ह
विनाश ही गढ़ता है
सृजन की दास्ताँ...




