Tuesday, 23 October 2012
Sunday, 8 January 2012
Sunday, 4 December 2011
पाथेय..
रे मन
कहाँ चाहते हो विचरना
औ सुनो..
ठहरने का ठौर भी कहाँ है ?
इसलिए बाँध लो पाथेय
जिस पथ मैं रुकूँ
तुम चलो..
भींच कर यूं मुठ्ठियाँ
कैद क्या हो कर रहे
विस्मृत कर स्मृतियाँ
बस बढ चलो
जो राह मिले
नेह में यदि मैं गिरूँ
तुम उठो..
सुनो..
क्या चाहते हो खोजना
जो मुस्कराहट के
बीज बोये थे
वो फसल
काट ली है किसी ने
अच्छा हुआ..
वो फलियाँ प़क कर
नासूर बन गयी थी
शूल पथ पर
यदि मैं थकूँ
तुम चलो..
बांध
भावनाओ का
भर गया था
इन मुई पलकों में
आज जम गया
अभी- अभी इसे छूकर गयी है
भावहीन ठंडी बयार
शीत बनकर जिस पथ
मैं जमूं
तुम बहो..
बातें पर्वतों की तरह
खड़ी हो गयी थी जो
चल पड़ी हूँ वहां से
ये व्यथा बनाएगी
इक नया रास्ता
दीप बनकर जिस पथ
मैं बूझूं
तुम जलो..
लीक पर तू मत विचरना
लीक पर तो वो चले
जिनके दुर्बल हों चरण
जो पथ स्वयं से
मैं बुनू
वो तुम चुनो ..
मैं मुसाफिर, तू मुसाफिर
शूल से फिर क्यों डरें
इक ठांव जो हम रुक गए
तो फिर
पथिक ही क्या रहे
इसलिए
बाँध लो पाथेय
जिस पथ मैं रुकूँ
तुम चलो...
Saturday, 20 August 2011
हाशिये पर..
घात अघात के मध्य
उर की तप्त व्यथाएं
न जाने कब?
बन जाती हैं
करुण कथाएँ
क्षीण कंठ की
रात के पसरे सन्नाटे में
नींद से कोसों दूर
भक्क लाल आँखों में
जलती रहती हैं स्मृतियाँ
कुछ चुह्चुहाई बूंदों से
सने होते हैं गाल
और आँखों से निरंतर
उठता रहता है धुंआ
भींच लेती हूँ मुट्ठियाँ
देखती हूँ लकीरें हाथों की
जो सहसा धुंधलाती
प्रतीत होती हैं
ठीक रात जैसी
दिखती है तस्वीर
खिचें हैं अनगिनत
आड़े तिरछे हाशिये
शायद..
यादों के निशां
बदल रहे हैं अपनी
दिशा-दशा
नक्षत्रों के नीचे
इस पार
पसीजते हैं पल
उस पार..
सब समझते हैं
कितनी खूबसूरत है ज़िन्दगी ..!
Tuesday, 2 August 2011
उपहार..
कुछ खास अवसरों पर देखती हूँ
लोग कुछ खास करना चाहते हैं
जाकर तरह-तरह की दुकानों में
बिलकुल अलग कुछ मांगते हैं
जाने कितने रंगों से भरा समंदर
समेटे होता है हर काउंटर
कुछ भी चुन लीजिये साहब
हर तरह के उपहार हैं
कुछ आकृतियाँ, कुछ ग्रीटिंग कार्ड हैं
कुछ पर शिमला-मसूरी-देहरादून हैं
कुछ पर नावें और सतरंगी फूल हैं
कहीं कान्हा के संग राधा है दीवानी
कहीं जंगल बादल और है झरने का पानी
ये मूर्तियाँ हैं फेंगशुई की
घर में खुशहाली लाती हैं
दुकानदार की ये बातें
मुझे परेशान किए जाती हैं
मौन होकर सोचती हूँ
क्या तुम्हें भी ये उपहार पसंद हैं!
गिने चुने अवसरों के बाद जिनका
न कोई रूप है न रंग है
कुछ ऐसा लेना है मुझको
जो महज अवसरों पर नहीं
अकेलेपन, बेरौनक उदासी के समय
तय कर सके लम्बी दूरी
और झट से तुम तक पहुँच कर
साक्षी हो जाए मेरे अपनेपन का
अनोखा साथी मन के सूनेपन का
एक ऐसा उपहार
जिसमें सौहार्द का स्पर्श
आत्मीयता की गंध हो
दिखावट से मुक्त
जो स्वतंत्र हो, स्वच्छंद हो
एक ऐसा उपहार जो तुम्हें
सचमुच पसंद हो..
( यह कविता मैंने अपने एक मित्र के लिए लिखी है जिसका उपहार मुझ पर उधार है..)
Monday, 25 July 2011
कवच..
सुनो !
हे यायावर..
निशदिन
स्वर्णिम बेला में
नक्षत्रों के मध्य
दीप्तिमान रहकर
भर-भर अन्जुलियाँ
प्रक्षालित करते हो
वात्सल्य की
गुनगुनी धूप..
गुनगुनी धूप..
अंशुमाली संग..
रथ पर सवार हो
तुमसे ही प्राप्त
तुमसे ही प्राप्त
नेह रश्मियाँ
प्रत्येक प्रत्युष मुझे
कर देतीं हैं भाव विभोर..
प्रति दिव
दिए संस्कारों संग
चलती हूँ धरित्री पर..
गभुआई सुथराई
करती है..
नित्य-प्रति आलिंगन
दूब के बिछौने पर,
झरता रहता है आशीष
सरसराते पत्तों संग..
स्वतः ही
खिलखिलाकर
सरपट दौड़ जाती है
बयार..
ढरकाते हुए स्नेह
उत्ताल ललाट पर
सम्मुख है दीखता
उत्सव हरसिंगार का
बेलौस झूमकर
नेपथ्य में है अटा पड़ा..
तारकों की
उद्दाम विभाओं संग
जीवन पाथेय के
उत्तम, धवल दर्शन
अनुदिन दे देते हो
आज भी
कवच बनकर
मंडराती रहती है
मलयज पवन
चहुँ ओर
हर पल -हर क्षण ..
Wednesday, 8 June 2011
निशदिन..
अंतस के कोरों में
चुपचाप खिलते हैं
धमनी-शिराओं में
घुलते -रहते हैं
निशदिन, पलछिन..
ज़मीं हो या फ़लक
निहारती हूँ जहाँ कहीं
हौले से बरस जाते हैं
ज्यों स्वर्ग से उतरे हों अभी
रहते हैं खिले खिले
दूधिया यूं धुले धुले..
बड़े ठाट से
चढ़कर धड़कनों पर
चढ़कर धड़कनों पर
उतर आते हैं
भीतर आत्मा तक
भीतर आत्मा तक
रहते हैं नितांत मेरे
सांसों में महकते हैं..
पापा कहते हैं
माँ के पास अथाह धीरज है
फिर भी मुझे गले से लगाकर
प्रस्फुटित हो जाता है प्रपात
और फिर
झरते हैं आसमान से
झरते हैं आसमान से
माँ के नेह के फूल ..
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