Monday, 25 April 2011

देवताओं की टीआरपी............

  लेडीज ही बढ़ाती हैं देवताओं की  टीआरपी...



इतना गुस्सा काइकू  गॉड ? अरे, ये तो समझो कि ये लेडीज आपसे कितना प्यार करती हैं। और वैसे भी गुस्सा तो राक्षसों का  गहना होता है, तो प्लीज गॉड टेक  ए चिल पिल।

मार्केट से लौटते समय उस मंदिर के  आगे रोज मेरे पांव ठिठक जाते हैं। लेडीज दीवानों की तरह भीड़ लगाकर वहां खड़ी होती हैं। सूट वालियां भी, साड़ी वालियां भी और जींस वालियां भी। सब के सब एकता  कपूर के  सीरियल से सीधे भागकर आए हुए से। इतने रिलीजियस लोग या तो उन सीरियलों में देख लो, या फिर उस मंदिर के  आगे। आखिर मैंने झां कर देख ही लिया कि कौन  से भगवान का  निवास है वहां। देखा तो बिलकुल  उस ऐड की तरह शॉक  लगा, शॉक  लगा, शॉक  लगा। और एकदम सीरियल वाले स्टाइल दिल में एकाएक  हुआ - नहींईईईई.... ये क्या ? अभी तक  तो सिर्फ हनुमान जी के  बारे में सुना था। शनिदेव तुम भी ? यू टू ? भेजा घूम गया था, वहां लगे बोर्ड की वजह से। आप खुद ही पढि़ए - लिखा है महिलाएं दूर से ही दर्शन करें , मूर्ति को  हाथ न लगाएं।

 हनुमान जी ब्रह्मचारी देवता हैं। लेडीज से दूर ही रहते हैं, ये तो पता था। अजी, पता क्या था एक  दिन एक  मंदिर में जाकर पुजारी जी ने फेस-टू-फेस बोल ही दिया। बच्चे को  लेकर हनुमान मंदिर जाने की जिद थी मम्मी जी की,  तो चल दिए आशीर्वाद लेने। पुजारी जी ने बच्चा गोद में लिया, एक  सेकेड को  रुके  और पूछ डाला - लड़की तो नहीं ? हमने फौरन कोरस में पूरे कानफीडेंस  से कहा - नहीं नहीं, लड़का  है,  लड़का है। पुजारी जी ने राहत वाली स्माइल दी और बच्चे को  लेकर चल दिए दर्शन कराने। 

एनीवे, उस दिन हनुमान जी के  बारे में सॉलिड ज्ञान मिला था कि  वह कितना सीरियसली लेडीज से दूर रहते हैं। लेकि न शनि देव आप भी।  आपसे तो मुझे सिम्पेथी थी। आप के ओवर एस्टिमेटिड खौफ की वजह से। साढ़े साती और उसका बुरा असर एंड ऑल दैट स्टफ। मगर आपने भी लेडीज को  इनफीरियर ही समझा है। इसका  रिलीजियस कारण क्या है, मैं उसमें पडऩा नहीं चाहती पर मुझे इनफीरियॉरिटी का  अहसास हुआ।

 पर आप  कुछ  जानते भी हो शनिदेव ? और आप भी सुनो हनुमान जी... जिन लेडीज से आप देवता लोग दूर भागते हो, वही तो आपकी असली फॉलोअर हैं, वही तुम्हारी टीआरपी बढ़ाती हैं और वही असली व्यूअरशिप देती हैं। क्योंकि पुरुष तो खुद देवता होता है  (नो ऑफेंस, लेकिन होता तो है ही,  पतिदेव कहते तो हैं कुछ लोग,  और वो करवा चौथ के  दिन तो देवत्व अपने पीक  पर होता है, हालांकि  उनकी   टीआरपी भी लेडीज ही बढ़ाती हैं)। इन पुरुषों का  वश चले तो आपको  जीरो व्यूअरशिप वाला कोई टीवी प्रोग्राम बनाकर रख छोड़ें। यकीन नहीं तो पूछ लो किसी भी ऐवरेज पुरुष से।  धर्म और भगवान के  नाम पर लड़ाई तो कर लेंगे, लेकिन पत्नी और परिवारव्रता तुलसी टाइप बीवी जब ऑफिस से शाम को  जल्दी घर आने को   कहती है कि हवन रखा है और तुम्हें पूजा में बैठना है तो इन्हीं से पूछो इनके  दिल पर कितनी छुरियां चलती हैं।

या फिर आप इनसे पूछो कि इनमें से कितने पर्सेंट पुरुष आपके  या दूसरे किसी भगवान का  व्रत रखकर रोज सुबह घंटी और शंख बजाते हैं। सर्वे  करवाओ, पता लगाओ, कंपेयर  करो।  अरे व्रत तो छोड़ो, घर में टाइम पर खाना न मिले तो राजेश खन्ना से अमरीश पुरी  के कैरेक्टर में घुसने में दो मिनट से ज्यादा नहीं लगते इन्हें। और अगर तुम्हें फैक्ट्स नहीं मालूम तो लेडीज को  ऐसे पोस्टर चिपकाकर  इनफीरियर होने का अहसास क्यों कराते हो भगवान जी।

मेरी एक  मौसी हैं जो लखनऊ में रहती हैं। वह हैं एकदम पूरी ठेठ भक्तन। घर में बाथरूम से बड़ा तो मंदिर बनवाया है। हर महीने भगवान की एक  नई मूर्ति मुंहमांगे दाम चुकाकर  लाती हैं। एक बार गांव जाकर वहां के मंदिर में बड़ी-सी मूर्ति स्थापित करने की ठान ली। शायद जयपुर से लाई थीं देवी माता की   संगमरमर की मूर्ति पूरे पचास हजार में। 

तामझाम के  साथ वे अपनी ससुराल पहुंचीं,  भंडारा लगाया, गांववालों के लिए भोज प्लान किया। मंदिर में मूर्ति पहुंचाई। पुजारी जी और घर के सभी पुरुष मंदिर पहुंचे, मगर अरे ये क्या मौसी जी, आप  कहां घुस रही हैं मंदिर के  अंदर ? बाहर ही रुकिए,  पढ़ी-लिखी लगती हैं,   इसीलिए नहीं मालूम कि  देवी माता की   मूर्ति स्थापना के समय लेडीज आर नॉट अलाउड।  (पता नहीं, अब ये कौन  से कोर्स में पढ़ाया जाता है,  जो पुजारी जी ने उन्हें पढ़ा-लिखा गंवार बताया)।
एनीवे, आप तो बस ये सोचो कि  कैसा वाला शॉक  लगा होगा मौसी जी को , वही ऐड वाला जिसमें सबक  बाल 90 डिग्री में खड़े हो जाते हैं।  इतना गुस्सा काइकू  गॉड ? अरे, ये तो समझो  कि ये लेडीज आपसे कितना प्यार करती हैं। और वैसे भी गुस्सा तो राक्षसों का  गहना होता है, तो प्लीज गॉड टेक  ए चिल पिल।

Thursday, 7 April 2011

नियति...


हुलसते  दृगों  में 
बह रहे थे स्वप्न हर्षिल 
वक्त का पहिया चला यूं
सब, मूक हैं निष्प्राण हैं

गंध बनकर  जो  मलय 
महकती थी चहुँ दिशा
रुख बदलकर चल पड़ी
नियति ही बलवान है

पुराने कोटर भी 
हो गए हैं रिक्त  
जिनमें रहते थे
जोड़े गिलहरियों के 

बेला, विदा की
संताप नहीं कोई 
समय के चक्र पर
मैं भी हूँ और तुम भी

उठ चली हूँ आज 
एक पथ के पथिक से
हो गयी हूँ मौन
उत्थान -पतनाघात से

जीवन इसी का नाम है 
रूकती नहीं कभी ये गति
सहज मूंदकर पलकें
  जो मिट गया वह जी गया

पंथ पर छोड़ दिए हैं 
मैंने कुछ पदचिन्ह 
विनाश ही गढ़ता है 
सृजन की दास्ताँ...

Monday, 21 March 2011

युगान्तरों तक...


प्रात  के  पहर  में 
अप्रतिम  रूप  से  फैली
अरुणिमा की सिन्दूरी विमायें 
करती हैं सर्जना 
प्रीत तूलिका की
प्रति,  दिन- बरस -  युग

झुरमुटों से झांकती 
अलसाई पड़ी सुथराई
  बहकर बयार संग 
गाती  राग फाग का
अटा पड़ा है लालित्य
हर,  पुष्प-विटप-निकुंज पर 

मुकुलित पड़े हैं सब 
कचनार-कुमुदनी औ 'कदम्ब'
भिन्न रंगों में रंग गए
 खेत-बाग-वन 

इक रंग तो मुझ पर भी है 
रहेगा युगों तक 
नेह-प्रेम -औचित्य का 
 गहराता जाता है 
हर क्षण - पल -पहर 

 देता है अपरिसीम पुलकित स्नेह 
अंतस से करता आलिंगन
गूंजता है चहुं ओर
चटक जैसे अंशुमाली 

रंग...
बन हर्षिल प्रभाएं 
करता  नव्याभिमाएं 
भरता पुष्प नवश्वास के 
हर शिरा - रोम -व्योम में 


 देखो ना 'सांवरे'
फाग के इन
  लाल-पीले-हरे-नीले 
विविध रंगों से 
कितना चटक है 
तुम्हारी प्रीत का रंग  
रहेगा मुझ पर बरसों-बरस 
युगान्तरों तक.....

Saturday, 5 March 2011

अव्यवस्थित स्नेह ....



पवन की पालकी पर सवार हो
पुलकित स्नेह का
नैसर्गिक सौंदर्य
निचोड़  देती हूँ अक्सर
बादलों की मुट्ठियों से
तुम तक पहुँचती तो होंगी
ये खुशबूदार बरसातें!


जिक्र तो किया था तुमने भी
रेशमी एहसासों का 
उपवन के  पहले गुलाब की खुशबू का 
बादलों के बीच मुकाम  का
बंद मुट्ठी  से निकली दुआ का 
और फिर ठिठक कर कहा ...जाने वो क्या था


तुम्हारे विचारों के झुरमुट से 
उन्नयन करता कड़वापन
इंगित कर देता है
संदेह की दस विमायें


ऐसा तो नहीं
मेरे स्नेह पुष्प चले गए हों
किसी अगत्यात्मक देश
बन कपूर की गोटी
शायद  घुल गए हों !


मत रखो आक्रोश
नहीं जंचता क्षोभ तुम पर
बाँट लो स्मृतियाँ
अव्यवस्थित कर दो स्नेहिल शब्द 
चटका दो पगे प्रेम का घड़ा

निः संकोच, संभव हो यथा 
बुहार दो अवशेष नेह के   
इतिवृत्तों को पोंछ दो
खींच दो हाशिये की  नदी
गढ़ों प्रेम के नए सोपान


संभवतः  
उस प्रणय  सरिता में
स्वायत्त प्रशमन करते 
तुम्हारे संदेहात्मक शब्द 
मोक्ष पाएं ...

Monday, 24 January 2011

       व्यथा कि गांठ .......  
     

तुम्हारे कहे शब्द,वर्ण 
अतिगुंजित हैं
आज भी मुझमें 
क्या तुम भी अनुभव कर पाते हो
मेरे अलसाये सवर्ण गीतों को

तुम्हारे पुलक अरण्य में
खिलते पुष्पों की
इक कलम
काट ली थी मैंने 
संभवतः मेरे निकुंज में भी
विराजे बसंत

दूर से निहारती हूँ
तुम्हारी सकुचाई यादों की पगडंडियों को
चलती रहती हूँ उस मोड़ पर
जो नया है मेरे लिए

तुम, जो हो गए थे
कथित दोष पूर्ण
झट से मांग बैठे थे
यादों का हर क्षण

कैसे दे देती तुमको
वो सारी यादें
बन के ठूंठ
कैसे रह पाती
जानते हो ना
   ठूंठ पर तो कभी पतझड़ भी नहीं आता 
 
  स्याह रातों में
खुल जाती है
व्यथा कि गाँठ
और भरभराकर गिर जातीं हैं
कुछ स्मृतियाँ
अपेक्षित प्रेम की

भक्क  लाल आँखों में
जलते रहते हैं पल...प्रतिपल 

रोम-रोम प्रेम से पगे
    तुम कहीं श्रेष्ठ
  तुम्हें रोक पाने में
       मैं रही अक्षम....

Tuesday, 18 January 2011

इंतजार.........

 











Saturday, 20 November 2010

सन्नाटा


         उर की अटल गहराइयों में बसे तुम 
         सपनों के हिलोरों संग दे जाते हो कुछ 
         कजरारी आँखों को  


          भावनाओं की गलियों से विचरते 
           तुम्हारे मीठे एहसास 
           दृग के कोरों से 
           धवल स्वरुप लिए 
           गिर जाते हैं 
            टप्प ........

           भींची  पलकें 
          अलकों के साए में 
          श्वेत फाहों से लद जाती हैं 
          नभ के किंचित अवशेष की मानिंद 


           संसृति के अगणित तारों के बीच 
           हर रात 
           रूह को  स्पर्शित करते हैं 
           ना जाने कितने आवरण 
           तुम्हारे नेह के 


           तुम्हारी स्मृतियों के साथ ही 
           छिटक जाती है 
           इक और बूँद 
           तुम्हारी याद की
    
            बस यूं ही मेरा सोचते रहना 
            लगातार - निर्विकार 
            पलक- दीवार- व्योम के उस पार .....

            भोर में ...
            सिन्दूरी अरुणिमा संग 
            दबा लेती हूँ 
            कुछ हिचकियाँ   


           कोशिश रहती है 
           अक्सर , ये मेरी 
           आवाज़ से ,
           सन्नाटा ना जाग जाये कहीं .......