Monday, 5 September 2016

आयु भर आशीष....

alka awasthifacebook



नित्य प्रति
व्योम के छोर में
छिन्न- भिन्न
टिमटिमाते हैं नाना - बाबा
झांकती हो तुम
विधु  के झरोखे से...

टपकाने लगती है रात
अमृत की
असंख्य बूंदे

कुलांचे भरते हरसिंगार को
थाम लेती है धरित्री

कुहुकती है कोयल
उन्मुक्त रंभाती हैं गायें

निथर आती है सुथराई
हरे - पीले पत्तों पर

अंशुमाली की प्रथम रश्मियों संग
उतर आता है प्रेम तुम्हारा
स्व में स्व से उगते क्षणों सा
देने को आयु भर आशीष..

अबोले
यूं ही मां
तू साथ है मेरे....

Sunday, 19 June 2016

सुनो हे पिता.....



फलानी दुकान से
लानी है किताबें
स्कूल में दिलाना है दाखिला ..


फलाने दर्जी से
सिलवानी है यूनिफार्म
 जिससे बच्चे की
फिटिंग बैठे ....


फलाने हलवाई से
 लाने हैं लड्डू
दाखिले की
खुशी जो है
साइकिल का टायर
फिर बनवा लूंगा ....


दिन -महीने और
जाने कितने साल
फलां -फलां करके
काट दिए तुमने....


 जाने कहां कहां से चुने
फूल जीवन के
बिना देखे
सबमें बांट दिए तुमने ....


सुनो हे पिता
 तुम्हारा तप
तुम्हारा त्याग
 तुम्हें ईश्वर से
बेहतर बनाता है
मेरे लिए सर्वोपरि हो तुम.....

Tuesday, 8 March 2016

शनै..शनै....

alka awasthi



टूट चुकी है साख
गहराने को हैं रंग 
दरख्तों के...

सरसों के रौंदे खेतों में 
कब, किसने देखी है !
बसंत की आवक..

कौन चढ़ाता है
सूखे फूलों को
देवालयों, मज़ारों पर..

 भट्ट लाल 
भानु के ताप से
सूख जाती हैं
 नदियां भी..

मैं नहीं हूं सागर
कि हो ..
अंबार..
गुंजाइशों का.....

मैं प्रेम हूं 
बहकर निकल गई
कोरों से...

Friday, 22 August 2014

घरौंदा....

alka awasthi


पलकों के संपुट तले
आंशिया है मेरा
घरौंदा मन का....

चली जाती हूं हर रात
उसे बुहारने
झाड़ने, पोंछने  
सुखद है यह अहसास भी....

सहेजा है
कमरेां  में
मीठी यादों को

तुम्हारी ठिठोली
तुमसे बतियाना
वो गंगा किनारे पहरों बिताना

चुस्कियां चाय की
गलियों में खो जाना
इठलाना- इतराना
तुम संग कुछ गुनगुनाना

हां बस ...
अब यही नियति है मेरी
सोचती हूं
क्यों नहीं बंद हो जाती
ये मुई पलकें
ऐसे ही सही
अहसास तो रहता तुम्हारा......

Friday, 8 August 2014

मां...शाश्वत

alka awasthi

चलती हूं मां
लौटूंगी जल्द ही
ध्यान रखना तुम घर का
मेरी चिन्ता में
आधी हो गई थी तुम भी .....

बड़बड़ाती थी मैं
जाने कैसे
रोकने को आंसू
जो थे आमादा
मां से लिपटकर रह जाने को

मां होती तो
नहीं रोक पाती खुद को
गिरा ही देती नमक
जिसे चखकर
नहीं बचता मेरे पास
कहने को कुछ भी

अपने हर कदम पर
देखती रही मुड़़-.मुड. के
अब नहीं दिखेंगी कभी
वो भरी भारी आंखें
और हिलता हुआ हांथ...

उफ् ये तल्ख अहसास
चिपक जाता है मां से

मां........
तुम्हारा न होना
नभ के उड.ने जैसा है
मानो शाश्वत अनिश्चित हुआ......

 

Saturday, 22 February 2014

तुम्हारी स्मृति. . .



तुमसे  बतियाना   
जैसे मरुस्थल का 
एकाएक हरा हो जाना 
लू के थपेड़ों के मैदान में 
सघन पीपल का गुनगुनाना
तुमसे बतियाना . . .
यानी-------
कैलेण्डर की उस तारीख का फूल बन जाना
जैसे घड़ी की सुइयों का खिलखिलाना 
उसके बाद भी देर तक 
मेरे अंतर्मन में उग आये 
कमल पत्तों पर 
तुम्हारा थिरकना 


तुम्हारा मुझे 
अच्छा आप हैं वही.......
कहने का अर्थ है 
मेरे शब्द कोष में 
नाचते मेघों तले
रिमझिम संगीत लिए 
पोखर का झील बन जाना 
गेहूं की पकी फसलों का 
सुनहरी झील बन जाना

तुमसे बतियाना .........
और टिमटिमाते  तारे 
तारों में तुम्हें तलाशना 
 बहना अश्रु झिपों  से झर -झर. . . . 


तुमसे बतियाना .........

Monday, 23 September 2013

वेदना...





नयनों में भर तुम्हारी दीठ
लटका लेती हूं पैर
सांझ के उस पार....

वेदना की काई
निकल आती है पोरों से...

बूझ नहीं पाती
प्रात की पहली सुथराई का
यूं झर-झर बहना

पलकों के संपुट खोल
लगाती हूं आवाज कर्कश
सभी वाद विवाद प्रतिवाद
दिखते हैं ..........
उंचे नीले वितान पर

अधर हिलते हैं
मैं समझ लेती हूं
जीवन गति छोड़
चाहता है विश्राम
मेरा ईष्ट......
दूर हो गया मुझसे!