पवन की पालकी पर सवार हो
पुलकित स्नेह का
नैसर्गिक सौंदर्य
निचोड़ देती हूँ अक्सर
बादलों की मुट्ठियों से
तुम तक पहुँचती तो होंगी
ये खुशबूदार बरसातें!
जिक्र तो किया था तुमने भी
रेशमी एहसासों का
उपवन के पहले गुलाब की खुशबू का
बादलों के बीच मुकाम का
बंद मुट्ठी से निकली दुआ का
और फिर ठिठक कर कहा ...जाने वो क्या था
तुम्हारे विचारों के झुरमुट से
उन्नयन करता कड़वापन
इंगित कर देता है
संदेह की दस विमायें
ऐसा तो नहीं
मेरे स्नेह पुष्प चले गए हों
किसी अगत्यात्मक देश
बन कपूर की गोटी
शायद घुल गए हों !
मत रखो आक्रोश
नहीं जंचता क्षोभ तुम पर
बाँट लो स्मृतियाँ
अव्यवस्थित कर दो स्नेहिल शब्द
चटका दो पगे प्रेम का घड़ा
निः संकोच, संभव हो यथा
बुहार दो अवशेष नेह के
इतिवृत्तों को पोंछ दो
इतिवृत्तों को पोंछ दो
खींच दो हाशिये की नदी
गढ़ों प्रेम के नए सोपान
संभवतः
उस प्रणय सरिता में
उस प्रणय सरिता में
स्वायत्त प्रशमन करते
तुम्हारे संदेहात्मक शब्द
मोक्ष पाएं ...






